यह सत्य है कि वर्तमान में भूमण्डल का प्रत्येक क्षेत्र किसी-न-किसी राजनीतिक इकाई से सम्बन्ध रखता है और उस इकाई की भौगोलिक वातावरण पर पूर्ण निर्भरता है। वर्तमान में राजनीतिक भूगोल, भूगोल विषय की महत्वपूर्ण स्वतन्त्र अस्तित्व वाली शाखा बन गई है। राजनीतिक भूगोल एक ऐसा अनुशासन है कि जिसका सम्बन्ध राजनीति विज्ञान तथा भूगोल दोनों से है। राजनीतिक भूगोल एक गतिशील विज्ञान है, क्योंकि यह विभिन्न राज्यों के अन्तर्गत राजनीतिक क्रिया-कलापों के परिवर्तनशील सम्बन्धों का तथा एक राज्य से दूसरे राज्य के मध्य विकसित परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन करता है।
मानव के विभिन्न कार्यों की भाँति राजनीतिक कार्य भी उसकी राजनीतिक इच्छा अथवा विचारधारा के परिणाम है। राजनीतिक इच्छा अथवा मानव समुदाय में विकसित राजनीतिक विचार सामूहिक एवं समान रूप से परिपक्व होकर जब धरातलीय अस्तित्व ग्रहण करते हैं, तो वहीं से राजनीतिक इकाई के रूप में राज्य के अस्तित्व की शुरूआत होती है।
समान राजनीतिक विचारधारा के साथ ही प्रारम्भिक राज्य का धरातलीय अस्तित्व विस्तृत होता है जो कि वहाँ उपलब्ध प्राकृतिक पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों में मानवीय अन्त:क्रिया से सम्भव होता है। इसी तरह धरातल के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग राज्यों का अस्तित्व सम्भव होता है। राजनीतिक भूगोल मानव के राजनीतिक क्रिया-कलापों और पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों के परिवर्तनशील अन्त:सम्बन्धों का क्षेत्रीय विश्लेषण करता है।
(Definitions)
1. अमेरिकन भूगोलवेत्ता वाल्केनवर्ग के अनुसार, “राजनीतिक भूगोल, राजनीतिक इकाइयों का भूगोल है और यह राष्ट्रों के मध्य अत:सम्बन्धों की भौगोलिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।"
2. फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता गोबलेट के अनुसार, “मानव भूगोल का जो भाग क्षेत्रीय सन्दर्भ में राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन करता है जैसे कि जीव विज्ञान जीवों का, उसे राजनीतिक भूगोल कहते हैं।"
3. ब्रिटिश भूगोलवेत्ता मूडी के अनुसार, “राजनीतिक भूगोल समुदाय तथा भौतिक पर्यावरण के मध्य
सम्बन्धों का विश्लेषण है।"
4. अमेरिकन भूगोलवेत्ता पाउण्ड्स के अनुसार, “राजनीतिक दृष्टि से संगठित क्षेत्रों उनके संसाधनों प्रसार एवं उनके द्वारा निर्मित विशिष्ट भौगोलिक स्वरूप से सम्बन्धित पक्षों का अध्ययन ही राजनीतिक भूगोल
है।"
5. अमेरिकी भूगोलवेत्ता अलेक्जेन्डर के अनुसार, "राजनीतिक भूगोल धरातलीय लक्षणों से प्रभावित राजनीतिक प्रदेशों का अध्ययन है जिसके अन्तर्गत राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मानव द्वारा विभिन्न प्रकार से क्षेत्र के संगठन का अध्ययन होता है।"
6. एक अन्य अमेरिकी भूगोलवेत्ता डी हिटलसी के अनुसार, “राजनीतिक भूगोल का सार तत्व (Kerneli ___ राजनीतिक क्षेत्र है जिसका महत्व उसके जलवायु, भू-आकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों से सुस्पष्ट रूप
से सम्बन्धित है।"
7. जेक्सन के अनुसार, “राजनीतिक भूगोल राजनीतिक उपक्रमों (Political Phenomena) का स्थानिक सन्दर्भ में अध्ययन है।"

अतः उपरोक्त परिभाषाओं से राजनीतिक भूगोल की प्रकृति के तीन दृष्टिकोण स्पष्ट है जो सम्बन्धों के रूप में पारिस्थितिकी, क्षेत्रीय एवं स्थानिक एवं संगठनात्मक अथवा आचरणात्मक है।
Nature of Political Geography
भौगोलिक विचारधारा का सार क्षेत्रीय विभिन्नता है। अतः एक स्थान से दूसरे स्थान के राजनीतिक तत्वों की विभिन्नता ही राजनीतिक भूगोल का उद्देश्य है। राजनीतिक तत्वों में निम्न बातें आती हैं
प्रथम-राजनीतिक भूगोल पृथ्वी तथा राज्य नामक दो संघटकों के मध्य स्थापित सम्बन्धों का अध्ययन है। पृथ्वी पर राज्य में राजनीतिक शक्तियों द्वारा जो तत्व उत्पन्न होते हैं, वे इसकी प्रकृति में आते हैं।
द्वितीय-इन शक्तियों को पैदा करने वाले विचार राजनीतिक घटक राजनीतिक प्रदेशों (राज्यों) की सीमांकन का आधार है और भू-भाग पर इसका राजनीतिक नियन्त्रण इसमें निहित है। राजनीतिक भूगोल राजनीतिक क्रिया-कलापों तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है।
तृतीय-राजनीतिक भूगोल में परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। राजनीतिक भूगोल में परिवर्तन के सिद्धान्त का अध्ययन भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक स्तर पर किया जाता है। इनमें भौगोलिक स्तर के परिवर्तन अति मन्द गति से होते हैं, जबकि आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन अति तीव्र गति से तथा राजनीतिक स्तर के परिवर्तन मध्यम गति से होते हैं। राज्य सम्बन्धी परिवर्तन एकाकी न होकर अन्तर्सम्बन्धित रूप में सम्पन्न होते हैं।
सभी प्रकार के अजैविक (Non-biotic) तत्व अर्थात् स्थिति, संरचना, जलवायु तथा जैविक तत्व (Biotic) जैसे-मानव जनसंख्या और उसके द्वारा विकसित आर्थिक क्रिया-कलाप आदि राज्य की विभिन्न राजनीतिक प्रक्रियाओं, घटनाओं को एक सीमा तक प्रभावित करते हैं और स्वयं भी प्रभावित होते हैं। राजनीतिक भूगोल राजनीतिक आधार पर संगठित क्षेत्रों का भौगोलिक अध्ययन है।
धरातलीय क्षेत्र (Territory) राजनीतिक इकाई (State) की भौगोलिक आवश्यकता है। इसी प्रकार बिना मानव (जनसंख्या) के राज्य नहीं बन सकता है।
धरातल पर राजनीतिक रूप से संगठित इकाई, मानव से सम्बन्धित होकर एक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक इकाई के रूप में सार्थक होती है। एक राज्य विश्व के धरातलीय स्वरूप के अंग होने के साथ ही विश्व राजनीतिक प्रतिरूप का एक भाग भी है। स्पष्ट है कि विभिन्न राज्य अपने स्थिर और गतिशील तत्वों के सन्दर्भ में एक-दूसरे से समानता अथवा असमानता में अन्तर्सम्बन्धित होते हैं।
कार्लसन ने ठीक कहा है कि "राजनीतिक भूगोल पृथ्वी एवं राज्य के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करके उनके भौगोलिक सम्बन्ध को व्यक्त करता है।" राजनीतिक भूगोल की क्षेत्रीय इकाई राज्य है और राज्य राजनीतिक विज्ञान का विषय है।
राजनीतिक विज्ञान की प्रकृति भी मानव की भाँति ही है जैसा कि मैकेण्डर ने कहा है, 'भूगोल प्रकृति के समान एक विज्ञान है, कला है और दर्शन है। अतः राजनीतिक विज्ञान भी एक विज्ञान, कला और दर्शन है। 'विज्ञान इसलिए कहा है क्योंकि यह वैज्ञानिक विधियों से निरीक्षण करता है। जिसके अन्दर आँकड़ों का संकलन, परिकल्पना, सिद्धान्त एवं मॉडल उपयोग होते हैं, जिनकी कभी भी वैज्ञानिक जाँच की जा सकती है।
कला इसलिए कहा है क्योंकि इसमें विषयगत विधि दृष्टिकोण से काम लिया जाता है। दर्शन इसलिए कर है क्योंकि इसमें दार्शनिक रूप से मानव-पर्यावरण सह-सम्बन्ध को समझने का प्रयास होता है। यह संकल्पना जाती है कि क्या, क्यों, कैसे और कहाँ एक राजनीतिक क्रिया भू-मण्डल पर घटित होती है। अन्तत राजनीतिक भूगोल एक अन्तर्रअनुशासित (Inter desciplined), लचीली प्रकृति वाली एवं गतिशील मत्रा दूर दृष्टिकोण वाली मानव भूगोल की शाखा है।
राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में वस्तुनिष्ठता एवं उद्देश्यात्मकता सुस्पष्ट होनी चाहिए। इस शाखा में भावनात्मकता का महत्व नहीं है। राजनीतिक भूगोल के अध्ययन एवं शोध के तीन क्रम है। प्रथम विषय से सम्बन्धित क्षेत्रीय अवलोकन तथा तथ्य एकत्रित करना, दूसरा एकत्रित सामग्री विश्लेषण तथा तीसरा विश्लेषण को ऐसे संजोना कि विषय प्रकृति स्पष्ट हो।